गुरुवार, 4 अक्‍तूबर, 2007

सरकारी स्कूल की दीवारें

सरकारी स्कूलों की
दीवारें अक्सर
ज्यादा उंची नहीं होती..
बड़ा आसान होता है
उन्हें यूं ही फांदा जाना..
मुझे अपने
स्कूल की दीवार कभी ज्यादा
ऊंची नहीं लगी
सरकारी तंत्र की हवा
आसानी से यहां आती जाती रही..
जाति..धर्म का एहसास
मास्टरों के दिमाग से होता हुआ
अक्सर मेरे अंदर
घुसपैठ करता रहा...
भ्रष्टाचार को
गुरु शिष्य परम्परा
के लबादे में..
कई बार सरकारी स्कूल की दीवारें
फांद कर आते देखा..
मास्टरो की डांट
अक्सर
स्कूल की दीवारें
फांद कर उनके घरों में
ट्यूशन पढ़ने के लिए
मजबूर करती रही..
आज भी जब अपने स्कूल
की ओर से गुजरता हूं
तो अपने भीतर की
एक छोटी दीवार का
एहसास हो जाता है...
( सरकारी स्कूल का वो सच जो मैने महसूस किया..ये मेरे निजी विचार हैं..सरकारी स्कूल को लेकर सहानुभूति मेरी भी है..लेकिन जो लिखा मेरा अपना अनुभव है..)

4 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

बिल्कुल सही चित्र है सरकारी स्कूल का. आज कल के प्राईवेट स्कूलों का तो इससे भी भयंकर हाल है.

Udan Tashtari ने कहा…

मास्टरो की डांट
अक्सर
स्कूल की दीवारें
फांद कर उनके घरों में
ट्यूशन पढ़ने के लिए
मजबूर करती रही..


---बहुत बेहतरीन चित्रण किया है-सरकारी स्कूल की जगह मात्र स्कूल भी दौड़ता...सभी जुड़ पा रहे होंगे आपकी बात से. बधाई.

राज यादव ने कहा…

बहुत अच्छा सुबोध जी ...बिल्कुल सच को बयां किया है आपने ...अच्छा लगा आपको पढना ...

Reetesh Gupta ने कहा…

मास्टरो की डांट
अक्सर
स्कूल की दीवारें
फांद कर उनके घरों में
ट्यूशन पढ़ने के लिए
मजबूर करती रही..

बहुत खूब ..सही कह रहे हो