सोमवार, 17 सितंबर, 2007

योग कहीं भी कभी भी

एक लंबी सांस लीजिए
थोड़ा धैर्य रखिए,
दूसरे के अपशब्दों को
उसके संस्कारों का
छिछलापन मानकर
भूल जाईये,
उनके बारे में सोचिए
जो आपको पसंद हैं,
उनकी खुशी को
महसूस करिए
जिनकी सरलता से
आपको खुशी मिलती हो,
अब सांस छोड़ दीजिए
और
खुद के अंदर छिपी
अथाह शांति को
महसूस कीजिए

वो मनहूस कोठी

गोरखपुर के तुर्कमान की वो कोठी...जिसमें कभी फ़िराक साहब का बचपन बीता..आज वहां सन्नाटा है..पुरानी सी दिखने वाली इस कोठी से वैसे तो फ़िराक साहब ने बरसों पहले अपना नाता तोड़ लिया था...फिर भी उनकी जिंदगी के एक आईने की तरह उनकी ये पुरानी कोठी...आज भी खड़ी है...हालांकि तुर्कमान में ये कोठी एक ऐसी मनहूस कोठी की तरह जानी जाती है...जिसने अपने मालिकों का सूकून कभी नहीं देखा..फिराक तो इसे मनहूस कोठी कह कर चले गए...लेकिन फिराक साहब से जिसने इस कोठी को खरीदा..उसका सूकून भी इस कोठी ने यूं छिना..कि पूरे तुर्कमान में इस कोठी के मनहूसियत के किस्से चर्चा में आ गए...आज इस कोठी के मालिक के तीनों बेटे दिमागी तौर पर पागल हो चुके हैं...कोठी में चल रहे एक स्कूल से आने वाले पैसे से इनकी जिंदगी की गाड़ी खीच रही हैं...लोग बताते हैं कि रघुपति सहाय यानी फिराक साहब से इस कोठी को खरीदने वाले हज़रात किसी जमाने में गोरखपुर की नामी शख्शियत हुआ करते थे...लेकिन कोठी के साथ उनका नाम जुड़ते उनकी जिंदगी का सुकून हमेशा के लिए छिन गया...खुद कोठी के लोग मानते हैं कि इस कोठी ने अपने हर मालिक कि किस्मत आंसुओं से लिखी...कोठी कि इसी बदनसीबी को भांप कर शायद फिराक ने इससे तौबा करना ही मुनासिब समझा था..पर आज फ़िराक साहब की पहचान रही..ये कोठी मनहूस कोठी के नाम से पुकारी जाती है...और यही है इस कोठी का नसीब..