शनिवार, 29 सितंबर 2007

चेहरों कि झुर्रियां

मेरे मां बाप के चेहरों
कि
झुर्रियां
अक्सर मुझे
मेरी जिम्मेदारियों का
एहसास कराती हैं..
ये झुर्रियां बयां करती हैं
उन तमाम
जिंदगी के किस्से..
जहां रिश्तों के साए
में..
दुलार और फिक्र
के बीच..
एक कोना मेरा भी है..

2 टिप्‍पणियां:

महेंद्र मिश्रा ने कहा…

भाई सुबोध जी
आपका प्रयास सराहनीय है

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा भाव हैं, वाह!