शुक्रवार, 1 अगस्त 2008

माफ़ करना बाबूजी पार्ट २



वो दिन उसे आज भी याद थे... जब उसने दिल्ली में कदम रखा था... बाबूजी की ही जिद थी कि उनका लड़का जेएनयू में पढ़े... इत्तेफाक से जेएनयू में ही एडमिशन मिल गया... उस वक्त पढ़ाई के साथ साथ थियेटर और जन आंदोलन में हिस्सा लेना... उसका डेली का रुटीन था...गांव से दूर वो गोर्की के उपन्यासों में अपनी मां को खोजता रहता... उसे अक्सर अपनी मां याद आती...गांव की भोली भाली महिला...जिसके लिए पति के क्रांतिकारी विचार सनक और फिजूल की जिद भर थे...पति के विचारों से उन्हें कभी इत्तेफाक नहीं रहा...लेकिन पति के विचारों का सम्मान उन्होने हमेशा किया... साड़ी के तोहफे भर से खुश हो जाने वाली उसकी मां की आंखे भले आज धुंधला गई थी...लेकिन अपनी मां की तमाम यादें वो अपने साथ दिल्ली ले आया था...और वो नाम भी जो बड़े प्यार से उसकी मां से उसे दिया था...रवीश..

दिल्ली को उसने जेएनयू के क्रांतिकारी नजरिए से देखा... कार के शीशों से झांकती दिल्ली की जिंदगी उसे कभी पसंद नहीं आई... लेकिन जेएनयू कैम्पस में उसके लिए काफी कुछ था... यहां विचारों की वो जमीन थी...जो उसे अपने बाबूजी से मिली थी...जल्दी ही वो कॉलेज के वामपंथी स्टूडेंट पार्टी का मेंबर बन गया... वहीं एसएफआई के विरोध प्रदर्शन के दौरान उसकी मुलाकात मालविका से हुई थी....मालविका पोलिटिकल साइंस की स्टूडेंट थी...रुसो से लेकर मार्क्स तक गहरी समझ रखने वाली एक क्रांतिकारी लड़की....विरोध प्रदर्शनों और सेमीनारों में उसने कई बार मालविका को बोलते सुना था... उसके लिए मालविका अबूझ पहेली की तरह थी...कम लेकिन खरा बोलने वाली ...मालविका उसे प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि की सोफिया की तरह लगती...गरीबों और मजदूरों की लड़ाई को लेकर उसने मालविका को कई बार भावुक होते देखा था... मालविका के इसी जूनून को देखकर उसने समझ लिया था कि उसकी प्राथमिकताएं गरीबों और मजदूरों के हक की लड़ाई से शुरु होती है...और वहीं खत्म होती हैं... उस लड़की में एक अजीब सा आकर्षण था...वो एक ऐसी लड़की थी... जिसके मकसद साफ थे...पिता आईएएस अफसर थे... लेकिन फिर भी वो बस से ही कॉलेज आती थी...पिता की अफसरनुमा जीवनशैली उसे कभी पसंद नहीं आई... घर के लिए मालविका एक विद्रोही लड़की थी...और रवीश के लिए उसकी जिंदगी का मकसद...मालविका की तरफ उसका खिंचाव लगातार बढ़ रहा था... विचारों की जिस दुनिया में मालविका रहा करती थी... वो दुनिया रवीश को विरासत में मिली थी... बाबूजी की दुनिया भी मार्क्स और लेनिन के इर्द गिर्द घूमती थी... वो दुनिया को बदलते देखना चाहते थे...वो चाहते थे कि मजदूरी के पसीने की सही कीमत लगाई जाए... मालविका के विचारों में रवीश को अपने बाबू जी नजर आते थे...और इसलिए मालविका का आकर्षण उसके लिए कई गुना बढ़ चुका था...( आगे जारी )

4 टिप्‍पणियां:

Rohit Tripathi ने कहा…

dono baag padhe... ache bhi lage .. teesre ka intezar hai :-)

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Junaid ने कहा…

Bhai Bahut Acha prayas...
Ummeed hai is baar 3rd part aane me itna samay nahi lagega..

देवेश वशिष्ठ ' खबरी ' ने कहा…

फिर क्या हुआ... वो लड़की हैदराबाद तक कैसे पहुंची...

vikrant ने कहा…

mujhe 3rd part ka besabri se intajaar hai....