रविवार, 8 फ़रवरी 2009

खामोश...खबर बेखबर है...

पाकिस्तान को टीवी पर ललकार के लौटे एक टीवी पत्रकार से जब मैनें रवीश कुमार की स्पेशल रिपोर्ट का जिक्र किया....तो उनकी आवाज़ रुखी सी हो गई...बोले जिस दिन रवीश से मार्केट का टेन परसेंट मांगा जाएगा...तब देखेंगे उनकी पत्रकारिता...मैं भी चुप हो गया.. दरअसल उनके इस जवाब में मुझे उनकी मजबूरी से ज्यादा हिन्दी न्यूज चैनलों की लाचारी ज्यादा नजर आई...थोड़ी देर बार टीवी पर फिज़ा का तमतमाया चेहरा दिखाई देने लगा...सबकुछ लाइव चल रहा था...अचानक फिजा ने मीडिया को लगभग ज़लील करते हुए दो चार खरी खोटी बातें सुना डालीं...चूंकि सब लाइव था सो सारी बातें हवा में तैरते हुए दर्शकों तक भी जा पहुंचीं...लेकिन फिज़ा के गुस्से में मुझे पाकिस्तान को ललकारने वाले भाई साहब के सवाल का जवाब भी मिल गया..फिज़ा हम सब को हमारी बेशर्मी के लिए कमेंट के दो चार तगड़े तमाचे जड़ कर जा चुकी थी...ये फिज़ा का गुस्सा नहीं था... उन सभी लोगों का गुस्सा था जो हिन्दी मीडिया को मरते हुए देख रहे हैं...खबरों का तमाशा बनते हुए देख रहे हैं...
ये कड़वी सच्चाई है कि हम सब उस बाजार में खड़े हैं... जहां चंद लोग हमसे तमाशा बनने की फरमाइश कर रहे हैं...और हम उन्हें तमाशा दिखाकर खुश है...पैसे के लिए किसी भी हद तक जाने की मजबूरी में हमारे पैर जकड़े जा चुके हैं...इस बीच खबरों को लेकर हमारी संजीदगी पूरी तरह मर चुकी है... और हम अपने आप अपने प्रोफेशन का गला घोंट रहे हैं...दरअसल इस वक्त टीवी मीडिया को दो खांचों में बंटी नजर आती है... इसमें से एक इंडिया टीवी टाइप की पत्रकारिता है...जिसकी जमात कुछ ज्यादा बड़ी है...और ये रास्ता ज्यादा कठिन भी नहीं है...बस आपको खबरों को सनसनी में तब्दील करने की कला आनी चाहिए... दर्शको को बेवकूफ समझिए और कुछ भी दिखा दीजिए...हां फुटेज की चोरी करने की कला इस जमात में शामिल होने की महत्वपूर्ण शर्त है...जो आप आठवीं क्लास के किसी कम्प्यूटर में माहिर बच्चे से सीख सकते हैं...इतने भर से आप टीआरपी के हकदार बन जाते हैं...और आपके ऊपर पैसों की बरसात होने लगती है...
वहीं दूसरी जमात एनडीटीवी टाइप के पत्रकारों की है...उनका रास्ता मुश्किल भी है और उबाऊ भी..इसके लिए आपको खबरों की संजीदगी की एहसास होना जरुरी है...आपके ऊपर दर्शकों को कुछ बेहतर दिखाने का दबाव होता है...और इस मुश्किल काम में टीआरपी भी नहीं है...आज के हालात ऐसे पत्रकारों के लिए मुनासिब नहीं हैं और यही वजह है कि इंडिया टीवी टाइप पत्रकारों की जमात लगातार बढ़ रही है...और यकीन मानिए अगर हिन्दी दर्शकों को अभी भी अक्ल नहीं आई तो वो दिन दूर नही की पाखंडी बाबाओं और सांप बिच्छुओं से खेलने वाले सपेरों की जमात खुद को वरिष्ठ पत्रकार बताने लगेगी

5 टिप्‍पणियां:

shalini ने कहा…

subodh ji

acha hai aur sacha hai lakin gam etna hi hai koi jag ku nahi raha hai

shalini rai

अनिल कान्त : ने कहा…

पता नही हम कब जागेंगे .....अच्छा लेख ..


अनिल कान्त
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

परमजीत बाली ने कहा…

अच्छी पोस्ट लिखी है।

विनय ने कहा…

वाह भई ख़ूब पोस्ट लिखी


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गुलाबी कोंपलें

मिथिलेश श्रीवास्तव ने कहा…

सही कहा गुरु, आजकल पत्रकार ऐसे ही हैं..