शुक्रवार, 4 जून 2010

कल ये कहानी फिर छेड़ेंगे

तेज आवाज में बात करना सीख नहीं पाया और धीमी आवाज़ अब कोई सुनना नहीं चाहता। खामोशी से अपना काम करना सुस्त होने की निशानी है। चीखने से गले में खराश पैदा हो जाती है। बोलने से ज्यादा वक्त सोचने में बीतता है। सड़क पर चलते किसी शख्स को उसकी गलती के बावजूद भला बुरा कहने में हिचक अभी कायम है। आखिरी बार किसी को अपशब्द कब बोले थे ये भी याद नहीं। इन तमाम बीमारियों ने दिल्ली की आवोहवा में सांस लेना दुभर कर दिया है। बंद कमरे में सांस घुट रही है और खिड़की खोलने पर जहरीली हवा का खौफ है। लोगों की आवाज़ का शोर बढ़ा है। खुशियों को बाजार से डिस्काउंट में खरीद लाने की होड़ बढ़ी है। बेमतलब की बातें बढ़ी हैं फिजूल के किस्से बढ़े हैं। अब तो मजाज़ की तरह सारे के सारे चांद तारे नोच लेने का जी करता है गैर की बस्ती से दूर किसी सन्नाटे में खुद से बातें करने का जी करता है। जगमगाती जागती जिंदगियों से दूर फिराक की तरह ये कह देने का मन करता है की कल ये कहानी फिर छेड़ेंगे हम भी ज़रा अब सो ले हैं। फिलहाल तो शोर में अपनी आवाज सुनने की कोशिश कर रहा हूं। भीड़ में खुद को तलाश लेने की जुगत कर रहा हूं। पता है कि उधार की खुशियों से जिंदगी नहीं कटती।

6 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

sirji kavita thi ye to gadya jaisa kyun likha badhiya...mithaas bhara...shabdon ka mithaas

माधव ने कहा…

nice

shalini rai ने कहा…

khub kaha lakin yahi jindagi hai..or yahi bheed hai jisse ladna hai apne servival ke liye..subodh ji ab tare nochne ka bhi samay nahi hai...bus toda samay kisi taraf sone ko mill jata hai..kher maneye...

alok ranjan ने कहा…

सुबोध चुप रहने या मौन रहने को लोग अक्सर कमज़ोरी मान लेते हैं... लेकिन शायद ये नहीं जानते कि सहनशील और बातों को गहराई से समझने वाले ही अक्सर चुप रहते हैं... और जब कभी वो बोलते हैं तो बड़े बड़ों की बोलती बंद हो जाती है.. क्योंकि उन्हें पता होता है कि बोलने वाला सही है... और रही तुम्हारी बात उधार की खुशियों की तो ये जान लो खुशियां तुम्हारी ही होती हैं.. उसे उधार या खरीदा नहीं जा सकता... बस सोच को बदलो.. छोटी-छोटी खुशियों को जिओ... और उन्हें बांटो.. फिर देखो दिल्ली में ज़िंदगी कैसे बदलती है...

Maria Mcclain ने कहा…

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Rashmi @ sunshine ने कहा…

kya bat hai.....very nice!!