वक्त
हाथों से
फिसलता है
रेत की तरह
कोई करता है
उसे थामने की
कोशिश
तो कोई
खोल देता है
अपनी मुट्ठी
और
यहीं बदल जाती है
वक्त की पहचान
जिंदगी और मौत में
शनिवार, 25 अगस्त, 2007
वक्त
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मैने निराशा में जीना सीखा है..निराशा में भी कर्तव्यपालन सीखा है...मैं भाग्य से बंधा हुआ नहीं हूं...राममनोहर लोहिया
वक्त
हाथों से
फिसलता है
रेत की तरह
कोई करता है
उसे थामने की
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तो कोई
खोल देता है
अपनी मुट्ठी
और
यहीं बदल जाती है
वक्त की पहचान
जिंदगी और मौत में
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