गुरुवार, 2 अक्तूबर 2008

कमरे में बसी यादें


मेरे घर के ऊपर के कमरे में
अब कोई नहीं रहता
उसकी जुबान
अक्सर ताले में बंद रहती है
कमरे की सूरत
कुछ कबाड़खाने सी हो गई है
जिसमें अखबार की पुरानी कतरन जमा है
धूल की मोटी परत से
उस पर लिखे शब्द बेमानी से हो गए हैं
अखबार के तमाम फटे पन्नों से
अभी भी मुद्दों की आवाजें आती हैं
वो कुछ बोलना चाहते हैं
लेकिन उनकी आवाजें
बार बार खामोशी में घुल जाती हैं
कमरे में लगी पुरानी सीनरी
अब बहुत पुरानी हो गई है
धूल की परत उसकी बर्फ पर भी जमा है
उसे साफ करने
कमरे में कोई नहीं जाता
केवल उन समानों के सिवा
जिनके लिए अब घर में जगह नहीं है
मेरा कमरा कुछ कुछ
मेरी यादों की तरह है
जिसकी दहलीज पुरानी यादों की दस्तक
सुनने के लिए बेचैन है

4 टिप्‍पणियां:

Shalini ने कहा…

सुबोध जी बहुत अच्छी लगी आपकी ये कविता बहुत ही सहज रूप से आपने... अपने कमरे के बारे में लिखा और उस दोरान आपने मुद्दो से लेकर कई गम्भीर विषयो पर भी बात की... बहुत बढ़िया ... बहुत उन्दा ... बहुत आगे जायेगे आप... लिखते रहिये... मैं आपकी लिखावट की मैं बहुत बड़ी फैन हूं...शालिनी राय

Shalini ने कहा…

सुबोध जी आपने लिखना क्यो छोड़ दिया है...मैं चाहती हूं... आपकी बलॉक पर रोज कुछ नया पढ़ना.. प्लीज रोज कुछ लिखा करें... ये मेरी दरख्वाज है... आप से
शालीनी राय

javed ने कहा…

Bhai, alfazoo ke bosida jaal me, aap ne mazi ki sari parte palat di.
Just want to say……… it’s too good.

Reetesh Gupta ने कहा…

सुंदर अभिव्यक्ति...बधाई