सोमवार, 22 मई 2017

वामपंथ का रास्ता मुझे हमेशा मुश्किल लगा। क्योंकि बहुत तलाशने के बाद भी मुझे वहां धर्म की आड़ में छिपने की जगह नहीं मिली। जाति का वो जंगल नहीं मिला जहां फिजूल का दंभ छिपाया जा सके। गरीबी भूखमरी जैसे सवालो के जवाब में मुझे कोई आध्यात्मिक कोना नहीं मिला। न बड़ी बड़ी यज्ञशालाएं मिलीं जहां बुनियादी सवालों की आहूति देकर पाप से मुक्ति मिल सके। वामपंथ के हर कोने में मैने वो किताबें ही पड़ी देखीं जिनके पन्ने सवालों से टकराते टकराते फट चुके थे। उन किताबों में आईने थे जिसमें हमेशा अपनी शक्ल अजीब सी नजर आईं। किताबों के खुरदुरे पन्नों को छूकर यही महसूस हुआ कि धर्म जाति और झूठे दंभ के बिना हर इंसान, इंसान जैसा ही लगता है। आज इंसान का इंसान जैसा हो जाना ही तो सबसे मुश्किल और 'खतरनाक' विचार है। #वामपंथ_1

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