
बाजार में अब क्या क्या बिकना बचा है। मामला निजता की नीलामी तक जा पहुंचा है। आज से पंद्रह साल पहले हम ग्लोबलाइजेशन और बाजारीकरण के नफे नुकसान के सेमिनारों में हिस्सा लिया करता थे। राम पुनियानी से लेकर कश्यप जी जैसे बड़े बडे धुरंधरों के लेक्चर सुना करते थे। मार्क्स को समझने का सिलसिला शुरु ही हुआ था। लेकिन तब खतरा इतना बड़ा नहीं लगता था। शायद छोटे शहर ने भी इस डर से काफी हद तक महफूज रखा। लेकिन अब ये डर जिंदगी में घुसने लगा है। जिस पेशे में हूं उस पर बाजार हावी हो रहा है। काम करने की स्पेस कम होती जा रही है। सेक्स सर्वे हो रहे हैं और जंगल के बाथ सीन टीवी पर धड़ल्ले से चल रहे हैं। पॉलिटिक्स की खबरें बिकती कम हैं सो छोटे पर्दे से गायब हो रही हैं। बाजार ने सिस्टम का चौथा खंभा कमजोर करना शुरु कर दिया है। लिखने पढ़ने वालों के लिए अब ज्यादा स्पेस नहीं बची है। आपको ना कोई सुनने वाला है ना समझने की फुरसत ही किसी के पास है। आप कुढ़ते रहिए अपनी नॉलेज अपने पास रखिए लोगों को इसकी जरुरत नहीं है। ये संकट है या फिर एक दौर। मुझे नहीं लगता कि ये दौर है ये संकट की शुरुआत है। बाजार हमेशा नए के डिमांड और सप्लाई के सिद्धांत पर चलता है और ऐसे में अभी तो डिमांड की शुरुआत हुई है। आगे क्या क्या डिमांड होती है, देखते जाइए। सरकार न्यूज कटेंट को लेकर बेफिक्र है और हो भी क्यों ना। जो चैनल कल तक सरकार की नींद हराम करने का बूता रखते थे। उनकी ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव का कोई फर्क लोगों पर अब नहीं पड़ता। यही वजह है कि कपिल सिब्बल तक आसानी से कह जाते हैं छापते रहिए दिखाते रहिए हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन न्यूज चैनल के मालिक इस जलालत पर भी खामोश हैं। फिलहाल पुराना वक्त फिर से सामने है पूंजीवाद और बाजारीकरण के खिलाफ नारे कान में गूंज रहे हैं।





