खबरों को लेकर खबरदार बनने का नाटक क्यों। क्यों नहीं परचून की दुकान या फिर शराब का ठेका। माफ कीजिएगा न्यूज सेंस आपका मरा है लोगों का नहीं। बारिश केवल दिल्ली और मुंबई में नहीं होती बरखूद्दार, लखनऊ और मुज्जफरपुर में भी होती है। सड़कें वहां भी भरती हैं, जाम से दो चार वहां के लोग भी होते हैं। लेकिन तुम्हारे न्यूज सेंस की हदें दिल्ली और मुंबई से आगे बढ़ नहीं पाती। पैसे की मलाई यहीं है तुम यहीं की मलाई चाटते रहो। टीवी पर इंटरटेनमेंट चैनल के फुटेज दिखाकर तुम खुद को भले क्रिएटिव कहो। लेकिन हम तो इसे चोरी कहते हैं। तुम पैसे बनाने के चक्कर में क्या से क्या हो गए इसको लेकर तो अब हम भी कन्फ्यूज हैं। अंधविश्वास फैलाने में तो तुमने पाखंड का धंधा करने वाले ज्योतिषों को पीछे छोड़ दिया है। डर क्रिएट करने में तुमने हॉरर फिल्मों को पीछे छोड़ दिया है। तुमसे तो अच्छे वो कार्टून चैनल हैं जो कम से कम बच्चों को तो बांधे रखते हैं। तुम अपनी खबरों से दो मुल्कों के बीच बरसों में बनने वाले रिश्ते गंधा सकते हो। तुम अपनी खबरों से खली का फर्जी हैव्वा तैयार कर सकते हो। तुम अपनी खबरों से बालिका बधू की नई कहानी गढ़ सकते। लेकिन तुम अब अपनी खबरों से दो मुल्कों को पास नहीं ला सकते। तुम सरकारों को क्या हम आम आदमी को बेचैन नहीं कर सकते। बुरा लगे तो लगता रहे... तुम्हारा न्यूज सेंस तुम्हे मुबारक। तुम्हारी हदे यहीं तक है और छिछले शब्दों में कहें तो तुम्हारी औकात इतनी भर रह गई है। हा इतना जरुर कहूंगा, कि बारिश की रिपोर्टिंग करते करते अपने लिए इतना पानी खोज लेना जहां तुम अपने न्यूज सेंस के साथ डूबकर मर सको। मैने निराशा में जीना सीखा है,निराशा में भी कर्तव्यपालन सीखा है,मैं भाग्य से बंधा हुआ नहीं हूं...राममनोहर लोहिया
गुरुवार, 10 सितंबर 2009
तुम्हारा न्यूज सेंस तुम्हे मुबारक
खबरों को लेकर खबरदार बनने का नाटक क्यों। क्यों नहीं परचून की दुकान या फिर शराब का ठेका। माफ कीजिएगा न्यूज सेंस आपका मरा है लोगों का नहीं। बारिश केवल दिल्ली और मुंबई में नहीं होती बरखूद्दार, लखनऊ और मुज्जफरपुर में भी होती है। सड़कें वहां भी भरती हैं, जाम से दो चार वहां के लोग भी होते हैं। लेकिन तुम्हारे न्यूज सेंस की हदें दिल्ली और मुंबई से आगे बढ़ नहीं पाती। पैसे की मलाई यहीं है तुम यहीं की मलाई चाटते रहो। टीवी पर इंटरटेनमेंट चैनल के फुटेज दिखाकर तुम खुद को भले क्रिएटिव कहो। लेकिन हम तो इसे चोरी कहते हैं। तुम पैसे बनाने के चक्कर में क्या से क्या हो गए इसको लेकर तो अब हम भी कन्फ्यूज हैं। अंधविश्वास फैलाने में तो तुमने पाखंड का धंधा करने वाले ज्योतिषों को पीछे छोड़ दिया है। डर क्रिएट करने में तुमने हॉरर फिल्मों को पीछे छोड़ दिया है। तुमसे तो अच्छे वो कार्टून चैनल हैं जो कम से कम बच्चों को तो बांधे रखते हैं। तुम अपनी खबरों से दो मुल्कों के बीच बरसों में बनने वाले रिश्ते गंधा सकते हो। तुम अपनी खबरों से खली का फर्जी हैव्वा तैयार कर सकते हो। तुम अपनी खबरों से बालिका बधू की नई कहानी गढ़ सकते। लेकिन तुम अब अपनी खबरों से दो मुल्कों को पास नहीं ला सकते। तुम सरकारों को क्या हम आम आदमी को बेचैन नहीं कर सकते। बुरा लगे तो लगता रहे... तुम्हारा न्यूज सेंस तुम्हे मुबारक। तुम्हारी हदे यहीं तक है और छिछले शब्दों में कहें तो तुम्हारी औकात इतनी भर रह गई है। हा इतना जरुर कहूंगा, कि बारिश की रिपोर्टिंग करते करते अपने लिए इतना पानी खोज लेना जहां तुम अपने न्यूज सेंस के साथ डूबकर मर सको। मंगलवार, 1 सितंबर 2009
'मोहल्ला' का कीचड़नामा
रविवार, 30 अगस्त 2009
आडवाणी से क्या कहा भागवत ने (एक्सक्लूसिव)

( आडवाणी से क्या कहा मोहन भागवत ने इसकी जानकारी हमारे संवाददाता विमल कांत के हाथ लगी है...इस इंटरव्यू को आरएसएस के एक निष्ठावान कार्यकर्ता ने हमें मुहैया कराया है...हम आपको इतना भर बता सकते हैं कि ये स्वयंसेवक बीजेपी में बड़ी हैसियत रखता है और आडवाणी का काफी बड़ा शुभचिंतक बताया जाता है तो सुनिए क्या कुछ कहा सुना गया जब भागवत आडवाणी से मिलने पहुंचे )
आडवाणी....प्रणाम
भागवत.....प्रणाम आईये बैठिए आडवाणी जी
आडवाणी....इन मीडिया वालों ने तो नरक काट दिया है भागवत जी
भागवत....और आप क्या काट रहे हैं पार्टी को भारतीय झगड़ा पार्टी बना रखा है
आडवाणी....आप मुझ पर क्यों नाराज हो रहे हैं मैं तो बोलता ही कम हूं और कभी बोल भी देता हूं तो बाद में तुरंत कह देता हूं कि मुझे याद नहीं
भागवत....जसवंत जी कह रहे थे कि आपको सब पता था
आडवाणी....आपको पता है कि मैं अपने मस्तिष्क पर ज्यादा भार नहीं डालता इतिहास की ऐसी कई घटनाएं हैं जो मुझे स्मरण नहीं है तो बताईये मैं क्या करूं
भागवत....तो आप कहना चाह रहे हैं कि आप भुलक्कड़ हो चुके हैं
आडवाणी....देखिए भागवत जी राजनीति को दूर से देखने और राजनीति में रहकर चीजों को समझने में अंतर होता है. राजनीति में लाभ की चीजों को याद रखना पड़ता है और हानि की चीजों को भूल जाना होता है
भागवत....फिलहाल आपको अभी अभी क्या याद है
आडवाणी....यही की मैं पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का सबसे योग्य दावेदार था हूं और रहूंगा...युवा हूं...लौह पुरुष पार्ट टू भी कहें तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है
भागवत.... अब ये भी बता दीजिए कि आपको क्या क्या स्मरण नहीं है
आडवाणी....अगर आप मुझे नेता अपोजिशन का पद छोड़ने को कहेंगे तो थोड़ी देर बार ये आदेश स्मृति से लुप्त हो जाएगा. कंधार का मामले में मुझे सब पता था ये भी मुझे याद नहीं है...बाबरी मस्जिद को मेरे सामने गिरा दिया गया था ये भी मुझे याद होगा मुझे डाउट है...यही नहीं जिन्ना के संदर्भ में पाकिस्तान में मैं क्या क्या बोलकर आया था भागवत जी आपकी कसम खाकर कहता हूं वो भी स्मृति में धुंधला सा गया है
भागवत....अच्छा आप ये तो जानते हैं कि मैं कौन हूं
आडवाणी....जी ये तो आप पर निर्भर करेगा कि मैं क्या क्या याद रखूं क्या क्या भूलूं...मसलन आप इस्तीफा देने को कहेंगे तो मैं भूल सकता हूं कि आप कौन हैं...हा हा क्या करुं कम्बख्त मस्तिष्क भी
भागवत....आप स्वयंसेवक हैं ये तो याद है ना आपको
आडवाणी....हां मेरे मित्र बताते हैं कि इलेक्शन के टाइम तक जब संघ के सहयोग की आवश्यकता थी तो मुझे स्मरण था लेकिन चुनाव के बाद मैं भुल गया...अब आप मेरे पीछे पड़ गए हैं तो याद आ रहा है कि अभी हाल में आपने स्वयंसेवक संघ की बागडोर अपने युवा हाथों में संभाली थी
भागवत....जसवंत भी आप पर तमाम आरोप लगा रहे हैं आपको नहीं लगता कि पार्टी के साथ साथ आपकी छवि भी खराब हो रही है
आडवाणी.... भागवत जी मुंह ना खुलवाएं तो अच्छा होगा
भागवत....धमकी दे रहे हैं आप आडवाणी जी
आडवाणी....नहीं भागवत जी धमकी तो मैने आजतक किसी को नहीं दी आपको स्मरण होगा जब पार्टियामेट पर पाकिस्तान ने हमला कराया था तब भी हमने पाकिस्तान को देख लेने के सिवा कुछ नहीं किया...बंदरों की तरह आक्रमण की मुद्रा तो बनाई लेकिन कोई आक्रमण नहीं किया
भागवत....बुरा मत मानिएगा ये तो आपकी पुरानी आदत है
आडवाणी....हा हा हा हा संघ से जो सिखा वो देश को अर्पण करने में जुटा हूं
भागवत.... आडवाणी जी कब से खाकी नेकर धारण नहीं की
आडवाणी....स्मरण नहीं है जहा तक मुझे याद आता है है
भागवत....रहने दीजिए याद करने की जरुरत नहीं है बीजेपी नेताओं से कहिए सप्ताह में एक दिन खाकी नेकर आनिवार्य रुप से पहनें जिससे ये स्मृति में बना रहे कि वो संघ के कार्यकर्ता पहले हैं बाद में बीजेपी के
आडवाणी....आप भी नाहक इमोशनल होते हैं हमारे शिवराजजी और नरेन्द्र मोदी तो हमेशा ही खाकी नेकर धारण करते रखते हैं...
भागवत....तो इस्तीफा कब दे रहे हैं
आडवाणी....दे दूंगा...पहले प्रधानमंत्री बन जाऊं...पांच साल के कार्यकाल के बाद तो एक बार इस्तीफा देना पड़ता है राष्ट्रपति जी को सो तभी दे दूंगा...
भागवत....(हाथ जोड़कर) आडवाणी जी माफ कीजिए...जाइए बीजेपी की निष्ठावान नेताओं की लंबी कतार है...उनसे भी मिलना है
आडवाणी....नाराज मत होइये मुझे स्मरण है कि संघ.
भागवत....बस बस रहने दीजिए...और सुनिए अगर स्मरण रख पाएं तो रखिएगा कि बाहर मीडिया वाले भूखे कुत्ते की तरह माइक लिए आपके ऊपर लपकेंगे लेकिन आप कुछ बोलिएगा नहीं..
आडवाणी....ठीक है जैसी आपकी मर्जी...
आडवाणी....प्रणाम
भागवत.....प्रणाम आईये बैठिए आडवाणी जी
आडवाणी....इन मीडिया वालों ने तो नरक काट दिया है भागवत जी
भागवत....और आप क्या काट रहे हैं पार्टी को भारतीय झगड़ा पार्टी बना रखा है
आडवाणी....आप मुझ पर क्यों नाराज हो रहे हैं मैं तो बोलता ही कम हूं और कभी बोल भी देता हूं तो बाद में तुरंत कह देता हूं कि मुझे याद नहीं
भागवत....जसवंत जी कह रहे थे कि आपको सब पता था
आडवाणी....आपको पता है कि मैं अपने मस्तिष्क पर ज्यादा भार नहीं डालता इतिहास की ऐसी कई घटनाएं हैं जो मुझे स्मरण नहीं है तो बताईये मैं क्या करूं
भागवत....तो आप कहना चाह रहे हैं कि आप भुलक्कड़ हो चुके हैं
आडवाणी....देखिए भागवत जी राजनीति को दूर से देखने और राजनीति में रहकर चीजों को समझने में अंतर होता है. राजनीति में लाभ की चीजों को याद रखना पड़ता है और हानि की चीजों को भूल जाना होता है
भागवत....फिलहाल आपको अभी अभी क्या याद है
आडवाणी....यही की मैं पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का सबसे योग्य दावेदार था हूं और रहूंगा...युवा हूं...लौह पुरुष पार्ट टू भी कहें तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है
भागवत.... अब ये भी बता दीजिए कि आपको क्या क्या स्मरण नहीं है
आडवाणी....अगर आप मुझे नेता अपोजिशन का पद छोड़ने को कहेंगे तो थोड़ी देर बार ये आदेश स्मृति से लुप्त हो जाएगा. कंधार का मामले में मुझे सब पता था ये भी मुझे याद नहीं है...बाबरी मस्जिद को मेरे सामने गिरा दिया गया था ये भी मुझे याद होगा मुझे डाउट है...यही नहीं जिन्ना के संदर्भ में पाकिस्तान में मैं क्या क्या बोलकर आया था भागवत जी आपकी कसम खाकर कहता हूं वो भी स्मृति में धुंधला सा गया है
भागवत....अच्छा आप ये तो जानते हैं कि मैं कौन हूं
आडवाणी....जी ये तो आप पर निर्भर करेगा कि मैं क्या क्या याद रखूं क्या क्या भूलूं...मसलन आप इस्तीफा देने को कहेंगे तो मैं भूल सकता हूं कि आप कौन हैं...हा हा क्या करुं कम्बख्त मस्तिष्क भी
भागवत....आप स्वयंसेवक हैं ये तो याद है ना आपको
आडवाणी....हां मेरे मित्र बताते हैं कि इलेक्शन के टाइम तक जब संघ के सहयोग की आवश्यकता थी तो मुझे स्मरण था लेकिन चुनाव के बाद मैं भुल गया...अब आप मेरे पीछे पड़ गए हैं तो याद आ रहा है कि अभी हाल में आपने स्वयंसेवक संघ की बागडोर अपने युवा हाथों में संभाली थी
भागवत....जसवंत भी आप पर तमाम आरोप लगा रहे हैं आपको नहीं लगता कि पार्टी के साथ साथ आपकी छवि भी खराब हो रही है
आडवाणी.... भागवत जी मुंह ना खुलवाएं तो अच्छा होगा
भागवत....धमकी दे रहे हैं आप आडवाणी जी
आडवाणी....नहीं भागवत जी धमकी तो मैने आजतक किसी को नहीं दी आपको स्मरण होगा जब पार्टियामेट पर पाकिस्तान ने हमला कराया था तब भी हमने पाकिस्तान को देख लेने के सिवा कुछ नहीं किया...बंदरों की तरह आक्रमण की मुद्रा तो बनाई लेकिन कोई आक्रमण नहीं किया
भागवत....बुरा मत मानिएगा ये तो आपकी पुरानी आदत है
आडवाणी....हा हा हा हा संघ से जो सिखा वो देश को अर्पण करने में जुटा हूं
भागवत.... आडवाणी जी कब से खाकी नेकर धारण नहीं की
आडवाणी....स्मरण नहीं है जहा तक मुझे याद आता है है
भागवत....रहने दीजिए याद करने की जरुरत नहीं है बीजेपी नेताओं से कहिए सप्ताह में एक दिन खाकी नेकर आनिवार्य रुप से पहनें जिससे ये स्मृति में बना रहे कि वो संघ के कार्यकर्ता पहले हैं बाद में बीजेपी के
आडवाणी....आप भी नाहक इमोशनल होते हैं हमारे शिवराजजी और नरेन्द्र मोदी तो हमेशा ही खाकी नेकर धारण करते रखते हैं...
भागवत....तो इस्तीफा कब दे रहे हैं
आडवाणी....दे दूंगा...पहले प्रधानमंत्री बन जाऊं...पांच साल के कार्यकाल के बाद तो एक बार इस्तीफा देना पड़ता है राष्ट्रपति जी को सो तभी दे दूंगा...
भागवत....(हाथ जोड़कर) आडवाणी जी माफ कीजिए...जाइए बीजेपी की निष्ठावान नेताओं की लंबी कतार है...उनसे भी मिलना है
आडवाणी....नाराज मत होइये मुझे स्मरण है कि संघ.
भागवत....बस बस रहने दीजिए...और सुनिए अगर स्मरण रख पाएं तो रखिएगा कि बाहर मीडिया वाले भूखे कुत्ते की तरह माइक लिए आपके ऊपर लपकेंगे लेकिन आप कुछ बोलिएगा नहीं..
आडवाणी....ठीक है जैसी आपकी मर्जी...
गुरुवार, 27 अगस्त 2009
क्या कह रिया है
खबर से पहले चेतावनी...'इन खबरों
का वास्तविक घटना से कोई लेनादेना नहीं है। ये खबर डेस्क के कुछ खुराफाती लोगों की
दिमाग की उपज है।'
का वास्तविक घटना से कोई लेनादेना नहीं है। ये खबर डेस्क के कुछ खुराफाती लोगों की
दिमाग की उपज है।'
मंगलवार, 25 अगस्त 2009
राम राम! अरुण शौरी....
राम कब तक नैया पार लगाते। बीजेपी की राजनीति राम भरोसे कब तक चलती। जब तक चली तब तक बीजेपी ने खूब चलाई। लेकिन जब मुद्दा पुराना हुआ तो ओवरहालिंग भी काम नहीं आई। सत्ता आई और चली भी गई। अब पार्टी की कलह सामने है। जसवंत पार्टी से बाहर हैं और अरुण शौरी बगावत का बिगुल फूंक चुके हैं। कभी यूपी की महोना सीट से विधायकी का इलेक्शन हारने वाले राजनाथ अनुशासन के नाम पर मनमर्जी करने में जुटे हैं। कोई ये जानने को तैयार नहीं कि पार्टी की इस दुर्दशा के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है। दरअसल बीजेपी कन्फ्यूजन का शिकार है। ये कन्फ्यूजन चाल चरित्र और चेहरे का है। बीजेपी किस राह चले ये सवाल पार्टी के सामने गुत्थी बनकर खड़ा है। पार्टी की कट्टर छवि गठबंधन के लिए मुफीद नहीं है और उदार छवि पार्टी को आगे नहीं बढ़ा पा रही। कुछ कुछ यही भ्रम चेहरे को लेकर है। नए चेहरों के तौर पर बीजेपी में नरेन्द्र मोदी और सुषमा स्वराज के चेहरे नजर आते हैं। लेकिन आडवाणी की जिद के चेहरे के पीछे ये चेहरे गायब दिखते हैं। दरअसल आरएसएस ने बीजेपी को हमेशा अपनी संपत्ति की तरह समझा और इस्तेमाल किया। उसे अटल के उदार चेहरे से हमेशा एतराज रहा। राम के नाम पर बीजेपी की राजनीति तो चमक गई। लेकिन ये चमक वक्त के साथ फीकी पड़नी थी, सो पड़ी। बीजेपी राम की राजनीति का विकल्प नहीं तलाश पाई। दरअसल राम मंदिर को बीजेपी ने रामराज्य से जोड़कर मुद्दे को जरुरत से ज्यादा भावनात्मक बना दिया। राम को बीजेपी ने मसले के फ्रेम में तो उतार लिया लेकिन उसे अपनी राजनीति का आदर्श नहीं बना पाई। इसका साइड इफेक्ट ये हुआ कि राम फसाद का मसला बन गए और बीजेपी की राजनीति नफरत की राजनीति। फिलहाल तो अब बीजेपी का कन्फ्यूजन चरम पर है। अरुण शौरी शुरुआत हैं...पिक्चर अभी बाकी है...। सोमवार, 24 अगस्त 2009
कवरपेज पर 'जिन्न' आ
जिन्ना इंडिया टुडे और आउटलुक के कवरपेज पर हैं। जाहिर है जिन्ना का इतिहास वर्तमान के सामने खड़ा है। जिन्ना के बारे में पाकिस्तान के कन्फ्यूजन को समझना हो तो 1998 में बनी फिल्म 'जिन्ना' देखिए। ये फिल्म अंग्रेजी में बनी बाद में उर्दू में भी डब हुई। क्रिटोफर ली जिन्ना की भूमिका में है। राष्ट्रवादियों को ऐतराज हो सकता है क्योंकि फिल्म में शशि कपूर भी हैं। जो कहानी को नैरेटर के तौर पर आगे बढ़ाते हैं। फिल्म कमलेश्वर के 'कितने पाकिस्तान' के अंदाज में बढ़ती है। जिन्ना तमाम अनसुलझे सवालों के जवाब के साथ वर्तमान में शशि कपूर से मुखातिब हैं। कहानी जिन्ना के तमाम पहलुओं को छूती है लेकिन छिछले ढंग से। नेहरु इस फिल्म के असल खलनायक हैं। फिल्म में उन्हें अंग्रेजों के मोहरे के तौर पर पेश किया गया है। उनकी और एडविना की दोस्ती फिल्म में अंतरंगता की सारी हदें पार करती दिखती है। एक सीन मे जब जर्नलिस्ट नेहरु के कमेंट को कोट करके उनसे सवाल पूछते हैं तो जिन्ना कहते हैं कि मैं उसके लतीफों पर हंसता नहीं इसलिए वो ऐसी अफवाहें फैलाता है। जिन्ना के नजरों में महात्मा गांधी केवल मिस्टर गांधी हैं। उन्हें गांधी को महात्मा गांधी कहने मे एतराज है। फिल्म में अपनी सहूलियत के मुताबिक खलनायकों को चुनने के बावजूद नायक जिन्ना खुद ही पूरी कहानी में अन्तर्द्वन्द से जूझते नजर आते हैं। अपनी निजी जिंदगी के तमाम सवालों में जिन्ना बार बार उलझते हैं। बंटवारे में लाखों कत्ल के बाद जब ये सवाल उठता है कि क्या बंटवारा जरुरी था। तो जवाब में जिन्ना फिल्म के नैरेटर यानी शशिकपूर को ६ दिसम्बर के बाबरी विध्वंश की तस्वीरें दिखाते हैं और बताने की कोशिश करते हैं कि क्या हिन्दुस्तान में मुसलमान महफूज रह सकते हैं। एक सीन में जब लार्ड माउंटवेटन बंटवारे की जिद को जिन्ना का दीवानापन बताते हैं तो जवाब मे जिन्ना कहते दिखते हैं कि ये उतना ही पागलपन होगा कि छोड़ दिया जाए मुसलमान अक्लियत को मुतासिद हिन्दुओं के अक्लियत जेरे तस्लुद...। कहानी बार बार अंग्रेजों को हिन्दुस्तान का फिक्रमंद बताने की कोशिश करती है। फिल्म के संवाद बेहतरीन हैं। लेकिन इस फिल्म को खुद जिन्ना का किरदार कमजोर बनाता है। कुल मिलाकर जिन्ना पर बनी इस फिल्म के बहाने सरहद पार के इतिहास को समझना कठिन हो जाता है। बुधवार, 19 अगस्त 2009
बहस के रास्ते खोल दिए जसवंत ने
देश बंटा, मसले हुए, मुल्क छूटा और दुनिया की तस्वीर में हिन्दु्स्तान और पाकिस्तान का अक्स भी शामिल हो गया। दोनो मुल्कों ने बंटवारे के लिए अपने अपने नायक और खलनायक भी तलाश लिए। जिन्ना भारत के लिए खलनायक बन गए और पाकिस्तान ने उन्हें अपना नायक घोषित कर दिया। सदी की सबसे बड़ी त्रासदी ने दुनिया का इतिहास दो मुल्कों के नजरिए में बांट दिया। चूंकि दोनो मु्ल्क अपने अपने इतिहास अपने नजरिए से लिख चुके थे सो बहस के रास्ते भी हमेशा के लिए बंद हो गए। लेकिन जसवंत के बहाने बहस के रास्ते फिर से खुले और आडवाणी के बाद दूसरी बड़ी कुर्बानी जसवंत को देनी पड़ी। जसवंत ने ये सवाल फिर से जिंदा कर दिया कि क्या विभाजन वाकई केवल जिन्ना की जिद्द का नतीजा था। या फिर नेहरु और पटेल भी इस बंटवारे के बराबर के जिम्मेदार थे। निश्चित तौर पर सवाल पेचीदा हैं। आरएसएस और बीजेपी नेहरु को विभाजन का दोषी ठहराती रही है, लेकिन उसे पटेल को कटघरे में खडा़ करने से एतराज है। ऐसा नहीं कि आरएसएस और बीजेपी ने अपने नजरिए से इतिहास में जाकर छेड़छाड़ नहीं की। उसने भी इतिहास को अपनी सहूलियत की हदों तक जाकर बदला है लेकिन इतिहास के सच का कसीलापन बीजेपी को बर्दाश्त नहीं। राम की राजनीति करने वाली बीजेपी जिन्ना के जिन्न से घबरा गई। फिलहाल जसवंत सिंह ने जिन्ना के बहाने बहस की जो गुंजाइश छोड़ी है उस पर बात करने की जरुरत है। ये जानने की जरुरत है कि कभी नमाज ना पढ़ने वाले जिन्ना को मजहबी देश की मांग के लिए किन हालातों में मजबूर होना पड़ा। साथ ही सवाल ये भी है कि विभाजन को लेकर अगर नेहरु के दिल में टीस थी तो उन्होने बंटवारे की लकीरों को मिटाने की कोशिश बाद के सालों में क्यों नहीं की। सच कड़वा है और जरुरत है सार्थक बहस की.
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